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योगदर्शन(योगसूत्र) का उद्भव :-
आज के समय मे योग शब्द से कौन परिचित नही है हमारे भारतवर्ष में ही नही बल्कि पूरे विश्वभर में योग का प्रचार-प्रसार हो रहा है कुछ ही वर्षो पहले इस विद्या को जानने वाले लोग बहुत ही न्यून थे भारत के अलावा इस योग विद्या को अन्य कोई देश नही जानता था योग का उद्भव वेदों से हुआ ऐसा माना जाता है क्योंकि समस्त विद्या का ज्ञान वेदों से जन्म लेता दिखाई देता है वेदों में छिपे योग विद्या के गूढ़ रहस्यों को समझाने के लिये  महर्षि पतंजलि जैसे ऋषियों ने अपने शास्त्र में सूत्र रूप में पिरोया है योग को सामान्य भाषा मे यदि देखा जाये तो यह दो रूपों में प्रचलित है
1).व्यायात्मक योग जिसमे भिन्न-भिन्न प्रकार के योगासन , व्यायाम, बन्ध, मुद्रा आदि क्रियाएं की जाती है यह योग का स्थूल रूप कहा जा सकता है।
 2). दूसरा क्रियात्मक योग या क्रियायोग के नाम से जाना जाता है इसको जानने वाले साधक आज के समय में विरले ही है सही मायने में क्रियायोग ही योग की आत्मा है  क्रियायोग को छोड़कर अन्य योग जिसको हम व्यायात्मक योग कह रहे है शरीर को बाहरी मजबूती प्रदान करते है या ये कहे कि स्थूल शरीर के लिये ही उपयोगी है शरीर की आन्तरिक शुद्धि करने का कार्य क्रियायोग साधना द्वारा ही सम्भव है मनुष्य अपने जीवन मे दुःखो से कैसे छुटकारा पाये अर्थात सुख को कैसे प्राप्त करे इसके लिये हमारे ऋषियों ने शास्त्रों व ग्रन्थों की रचना की जिसमे योगदर्शन योगसूत्र नामक शास्त्र सबसे अधिक प्रचलित हुआ जिसके रचियता  महर्षि पतंजलि जी है अन्य सभी योग ग्रन्थों का मूल भी यही है इसको योगदर्शन के नाम से जाना जाता है जिसके भाष्यकार महर्षि वेद व्यास जी है।


योगदर्शन(योगसूत्र) का परिचय:-
योगदर्शन वह महान योग शास्त्र है जिसके अन्दर सभी योग निहित है अर्थात सभी योग ग्रन्थों का मूल भी यही है क्योंकि यह योग पर आधारित सबसे प्राचीन व प्रामाणिक शास्त्रो में से एक है
महर्षि पतंजलि जी ने अपने योगदर्शन ग्रन्थ में अपनी बात को सूत्रों के रूप में कहा है उन्होंने वेद में संकलित इस रहस्यमयी योग विद्या को मनुष्यों के कल्याण हेतु इस ग्रन्थ की रचना की है।
योगदर्शन में योगसूत्रों को सरल भाषा मे समझाने के लिये महर्षि वेद व्यास जी इसकी व्याख्या की है।
योगदर्शन में महर्षि जी ने 195सूत्रों की रचना की है।
इसके क्रमशः चार पाद समाधिपाद(51सूत्र) ,साधनपाद(55सूत्र), विभूति पाद(55सूत्र) और कैवल्य पाद(34सूत्र)है

उद्देश्य:- 
महर्षि पतंजलि जी  का योगदर्शन नामक ग्रन्थ की रचना करने का एक ही मुख्य उद्देश्य दुःखो से निवृत्ति, सुख की प्राप्ति, अर्थात मोक्ष को प्राप्त करना है इसलिये जो योग साधक महर्षि पतंजलि जी के द्वारा अपने योगसूत्रों में बताये गये आठ नियमों का पालन करता है वह निश्चित ही सुख-दुख के बंधन से मुक्ति पा सकता है अर्थात वह समाधि प्राप्त कर सकता है महर्षि पतंजलि जी के द्वारा बताये गए आठ सिद्धान्त यम, नियम, आसन ,प्राणायाम, प्रत्याहार ,धारणा, ध्यान व समाधि है इसे अष्टांग योग के नाम से भी जानते है अतः योग के इन आठ अंगो का पालन करने वाला योगसाधक मोक्ष व ईश्वरत्व का प्राप्त कर जन्म-मरण के बन्धन से मुक्त हो सकता है इसी को मुक्ति कहा है यही योग का मुख्य उद्देश्य भी है।

महर्षि पतंजलि कृत योग सूत्र -योग और अध्यात्म का महाग्रंथ





योगदर्शन(योगसूत्र) का उद्भव :-
आज के समय मे योग शब्द से कौन परिचित नही है हमारे भारतवर्ष में ही नही बल्कि पूरे विश्वभर में योग का प्रचार-प्रसार हो रहा है कुछ ही वर्षो पहले इस विद्या को जानने वाले लोग बहुत ही न्यून थे भारत के अलावा इस योग विद्या को अन्य कोई देश नही जानता था योग का उद्भव वेदों से हुआ ऐसा माना जाता है क्योंकि समस्त विद्या का ज्ञान वेदों से जन्म लेता दिखाई देता है वेदों में छिपे योग विद्या के गूढ़ रहस्यों को समझाने के लिये  महर्षि पतंजलि जैसे ऋषियों ने अपने शास्त्र में सूत्र रूप में पिरोया है योग को सामान्य भाषा मे यदि देखा जाये तो यह दो रूपों में प्रचलित है
1).व्यायात्मक योग जिसमे भिन्न-भिन्न प्रकार के योगासन , व्यायाम, बन्ध, मुद्रा आदि क्रियाएं की जाती है यह योग का स्थूल रूप कहा जा सकता है।
 2). दूसरा क्रियात्मक योग या क्रियायोग के नाम से जाना जाता है इसको जानने वाले साधक आज के समय में विरले ही है सही मायने में क्रियायोग ही योग की आत्मा है  क्रियायोग को छोड़कर अन्य योग जिसको हम व्यायात्मक योग कह रहे है शरीर को बाहरी मजबूती प्रदान करते है या ये कहे कि स्थूल शरीर के लिये ही उपयोगी है शरीर की आन्तरिक शुद्धि करने का कार्य क्रियायोग साधना द्वारा ही सम्भव है मनुष्य अपने जीवन मे दुःखो से कैसे छुटकारा पाये अर्थात सुख को कैसे प्राप्त करे इसके लिये हमारे ऋषियों ने शास्त्रों व ग्रन्थों की रचना की जिसमे योगदर्शन योगसूत्र नामक शास्त्र सबसे अधिक प्रचलित हुआ जिसके रचियता  महर्षि पतंजलि जी है अन्य सभी योग ग्रन्थों का मूल भी यही है इसको योगदर्शन के नाम से जाना जाता है जिसके भाष्यकार महर्षि वेद व्यास जी है।


योगदर्शन(योगसूत्र) का परिचय:-
योगदर्शन वह महान योग शास्त्र है जिसके अन्दर सभी योग निहित है अर्थात सभी योग ग्रन्थों का मूल भी यही है क्योंकि यह योग पर आधारित सबसे प्राचीन व प्रामाणिक शास्त्रो में से एक है
महर्षि पतंजलि जी ने अपने योगदर्शन ग्रन्थ में अपनी बात को सूत्रों के रूप में कहा है उन्होंने वेद में संकलित इस रहस्यमयी योग विद्या को मनुष्यों के कल्याण हेतु इस ग्रन्थ की रचना की है।
योगदर्शन में योगसूत्रों को सरल भाषा मे समझाने के लिये महर्षि वेद व्यास जी इसकी व्याख्या की है।
योगदर्शन में महर्षि जी ने 195सूत्रों की रचना की है।
इसके क्रमशः चार पाद समाधिपाद(51सूत्र) ,साधनपाद(55सूत्र), विभूति पाद(55सूत्र) और कैवल्य पाद(34सूत्र)है

उद्देश्य:- 
महर्षि पतंजलि जी  का योगदर्शन नामक ग्रन्थ की रचना करने का एक ही मुख्य उद्देश्य दुःखो से निवृत्ति, सुख की प्राप्ति, अर्थात मोक्ष को प्राप्त करना है इसलिये जो योग साधक महर्षि पतंजलि जी के द्वारा अपने योगसूत्रों में बताये गये आठ नियमों का पालन करता है वह निश्चित ही सुख-दुख के बंधन से मुक्ति पा सकता है अर्थात वह समाधि प्राप्त कर सकता है महर्षि पतंजलि जी के द्वारा बताये गए आठ सिद्धान्त यम, नियम, आसन ,प्राणायाम, प्रत्याहार ,धारणा, ध्यान व समाधि है इसे अष्टांग योग के नाम से भी जानते है अतः योग के इन आठ अंगो का पालन करने वाला योगसाधक मोक्ष व ईश्वरत्व का प्राप्त कर जन्म-मरण के बन्धन से मुक्त हो सकता है इसी को मुक्ति कहा है यही योग का मुख्य उद्देश्य भी है।

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