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पारिचय:-
गिलोय यानी अमृता धरती पर सभी औषधियों में सबसे श्रेष्ठ मानी जाती है।इसको गुडूची व Tinospora Cordifolia के नाम से भी जाना जाता है। यह लता के रूप में वृक्षो पर चढी रहती है। नीम के पेड़ पर चढी हुई गिलोय सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है प्रायः सभी प्रान्तों में यह आसानी से मिल जाती है। इसके पत्ते हृदय के आकार के समान होते है। इसके पत्ते को तोडने पर शहद के समान पीब सा निकलता है जो स्वाद में बहुत तीखा होता है। इसका तना मोटा होता है। इसकी विशिष्ट पहचान यह है कि इसकी बाह्य छाल हल्के भूरे रंग की कागज जैसी परतों में होती है। इसको छिलने पर अंदर से हरे रंग की चिकनी व रस से भरी हुई कांड होती है।


इसके अन्दर पाये जाने वाले मुख्य घटक:-

इसके पल्प या कांड में स्टार्च लगभग 1से 2 प्रतिशत व इसके अतिरिक्त अनेक कडवे जैव संघटक पाये जाते है।
इसके अन्दर तिक्त ग्लूकोसाइड,गिलोइमिन,कार्डिओल ,कार्डियोसाइड व टिनोस्पोरिडीन नामक जैव सक्रिय पाये जाते है
गिलोय में गिलोईन नामक एक कडवा ग्लूकोसाइड तथा टिनोस्पोरिन, पोमेरीन अम्ल पाये जाते है।
इसमें एक वाष्पशील तैल होता है एवम वसा , एल्कोहल तथा कईं प्रकार के वसा अम्ल होते है।


औषधीय प्रयोग व इसके लाभ:-
यह नेत्र रोगो में बहुत लाभकारी है इसके 10मि.ली. स्वरस में शहद व सेंधा नमक 1-1ग्राम मिलाकर अच्छी प्रकार से मिक्स कर नेत्रों पर अंजन करने से आपके नेत्र सम्बन्धी रोग नष्ठ होते है।
यह गठिया रोग में बहुत लाभकारी होती है । 3 से 5ग्राम गिलोय के चूर्ण को दूध के साथ दिन में 2-3 बार लेने से आपको आराम आता है।
बुखार होने पर इसके क्वाथ को दिन 2-3बार 3से 5 ग्राम एक गिलास में अच्छे से उबालकर छानकर पीने से बुखार जल्दी ही नष्ट हो जाता है।
यह आपके त्वचा सम्बन्धी रोगो को नष्ठ करता है।इसके 10-20मि.ली. स्वरस को दिन में 2-3 बार कुछ माह तक सेवन करने से आपके त्वचा सम्बन्धी रोग दूर होते है।
आपके शरीर मे कहीं पर भी सूजन हो तो गिलोय की 100-150 ग्राम बेल को कूटकर पानी मे अच्छे से उबालकर उसके पानी से सिकाई करने से सूजन उतर जाती है व दर्द में भी आराम आता है।

जानिए गिलोय के अद्भुत फायदों के बारे में....


पारिचय:-
गिलोय यानी अमृता धरती पर सभी औषधियों में सबसे श्रेष्ठ मानी जाती है।इसको गुडूची व Tinospora Cordifolia के नाम से भी जाना जाता है। यह लता के रूप में वृक्षो पर चढी रहती है। नीम के पेड़ पर चढी हुई गिलोय सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है प्रायः सभी प्रान्तों में यह आसानी से मिल जाती है। इसके पत्ते हृदय के आकार के समान होते है। इसके पत्ते को तोडने पर शहद के समान पीब सा निकलता है जो स्वाद में बहुत तीखा होता है। इसका तना मोटा होता है। इसकी विशिष्ट पहचान यह है कि इसकी बाह्य छाल हल्के भूरे रंग की कागज जैसी परतों में होती है। इसको छिलने पर अंदर से हरे रंग की चिकनी व रस से भरी हुई कांड होती है।


इसके अन्दर पाये जाने वाले मुख्य घटक:-

इसके पल्प या कांड में स्टार्च लगभग 1से 2 प्रतिशत व इसके अतिरिक्त अनेक कडवे जैव संघटक पाये जाते है।
इसके अन्दर तिक्त ग्लूकोसाइड,गिलोइमिन,कार्डिओल ,कार्डियोसाइड व टिनोस्पोरिडीन नामक जैव सक्रिय पाये जाते है
गिलोय में गिलोईन नामक एक कडवा ग्लूकोसाइड तथा टिनोस्पोरिन, पोमेरीन अम्ल पाये जाते है।
इसमें एक वाष्पशील तैल होता है एवम वसा , एल्कोहल तथा कईं प्रकार के वसा अम्ल होते है।


औषधीय प्रयोग व इसके लाभ:-
यह नेत्र रोगो में बहुत लाभकारी है इसके 10मि.ली. स्वरस में शहद व सेंधा नमक 1-1ग्राम मिलाकर अच्छी प्रकार से मिक्स कर नेत्रों पर अंजन करने से आपके नेत्र सम्बन्धी रोग नष्ठ होते है।
यह गठिया रोग में बहुत लाभकारी होती है । 3 से 5ग्राम गिलोय के चूर्ण को दूध के साथ दिन में 2-3 बार लेने से आपको आराम आता है।
बुखार होने पर इसके क्वाथ को दिन 2-3बार 3से 5 ग्राम एक गिलास में अच्छे से उबालकर छानकर पीने से बुखार जल्दी ही नष्ट हो जाता है।
यह आपके त्वचा सम्बन्धी रोगो को नष्ठ करता है।इसके 10-20मि.ली. स्वरस को दिन में 2-3 बार कुछ माह तक सेवन करने से आपके त्वचा सम्बन्धी रोग दूर होते है।
आपके शरीर मे कहीं पर भी सूजन हो तो गिलोय की 100-150 ग्राम बेल को कूटकर पानी मे अच्छे से उबालकर उसके पानी से सिकाई करने से सूजन उतर जाती है व दर्द में भी आराम आता है।

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